रूस के राष्ट्रपति विलादिमीर पुतीन ने इस देश में विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों से वीडियो लिंक के माध्यम से बात करते हुए फ़्रान्स की हालिया नीतियों के कारण मुसलमानों की भावनाएं आहत होने के मद्देनज़र बल देकर कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अन्य धर्मों के मानने वालों को तकलीफ़ पहुंचाने का बहाना नहीं बनना चाहिए। उन्होंने धार्मिक मतभेदों को भड़काने के उद्देश्य से किसी भी प्रकार की उत्तेजक कार्यवाही को रोके जाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि धार्मिक टकराव के परिणाम ख़तरनाक होते हैं जो बरसों तक रहते हैं। रूस के राष्ट्रपति का यह बयान वास्तव में फ़्रान्सीसी राष्ट्रपति अमानोएल मैक्रां के इस्लाम विरोधी रुख़ की आलोचना है जिन्होंने अपने देश में ईश्वरीय दूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अपमानजनक कार्टून बनाए जाने और इस्लाम के अनादर का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने औचित्य दर्शाया था। फ़्रान्स की सरकार और मैक्रां के इस अतिवादी रुख़ की प्रतिक्रिया स्वरूप चरमपंथियों की ओर से फ़्रान्स और ऑस्ट्रिया में कई आतंकी हमले हुए हैं।
पुतीन ने अपने बयान में दोनों पक्षों के इसी अतिवाद की तरफ़ इशारा किया है। उन्होंने मौजूदा जटिल हालात के बारे में कहा कि इस समय हम कुछ लोगों की भड़ाऊ कार्यवाहियों के साक्षी हैं जो अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर दूसरे धर्मों के मानने वालों की भावनाओं को आहत कर रहे हैं जबकि इसके मुक़ाबले में कुछ लोग इस स्थिति को अपनी हिंसक कार्यवाहियों के औचित्य के तौर पर पेश कर रहे हैं। पुतीन का कहना है कि इस बात का नतीजा दोनों पक्षों के बीच टकराव है जो पहले तो पहाड़ की ऊंचाई पर मौजूद बर्फ़ के एक गोले की तरह होता है लेकिन फिर धीरे धीरे वह बर्फ़ के तूफ़ान में बदल जाता है। इस तरह के टकराव के परिणाम बरसों व दशकों तक सामने आ सकते हैं। एक बड़े ऑर्थोडोक्स ईसाई देश के राष्ट्रपति के रूप में पुतीन का यह रुख़ इस बात को उजागर करता है कि रूस, पश्चिम के विपरीत इस्लामोफ़ोबिया की नीति और इस्लाम व मुसलमानों के अनादर में विश्वास नहीं रखता, इस लिए पश्चिम की नीतियों को पूरी ईसाइयत का रुख़ क़रार नहीं दिया जा सकता।
दूसी ओर हालिया दिनों में, यूरोप में इस्लामोफ़ोबिया की प्रतिक्रिया में फ़्रान्स और ऑस्ट्रिया में जो रक्तरंजित घटनाएं हुई हैं, उनसे पता चलता है फ़्रान्स के राष्ट्रपति मैक्रां की ओर से इस्लाम विरोधी कार्यवाहियों विशेष कर हास्य-व्यंग्य पत्रिका शार्ली हेब्दू की ओर से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अपमानजनक कार्टूनों के प्रकाशन के समर्थन की नीति का, मुसमानों को उकसाने व भड़काने और फ़्रान्स के समाज में तनाव बढ़ने के अलावा और कोई परिणाम नहीं निकला है। अगर वर्तमान परिस्थिति जारी रहती है तो इससे पूरे यूरोप में बहुत अधिक हिंसा बढ़ने की आशंका है। एक टीकाकार का कहना है कि फ़्रान्स, इस्लामी मान्यताओं के अनादर और इस्लाम के विरोध में दुनिया के सबसे आज़ाद देशों में से एक है।
इसी के साथ यह बात भी ध्यान योग्य है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने इस्लाम विरोधियों के हाथ खुले छोड़ने का मैक्रां का क़दम, फ़्रान्स के कई क़ानूनों से विरोधाभास रखता है। बुधवार को अनेक मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने दुनिया भर के लोगों विशेष कर फ़्रान्स के लोगों के नाम जो बयान जारी किया है, उसमें कहा गया है कि एक समूह के ख़िलाफ़ हिंसा और एक समूह की ओर से आंखें बंद रखने जैसे काम प्रजातंत्र से मेल नहीं खाते हैं। इस बयान में कहा गया है कि फ़्रान्स ने मानवाधिकारों विशेष रूप से नस्लभेद, नफ़रत फैलाने और भेदभाव की रोकथाम के लिए कुछ क़ानून पारित किए हैं और ये क़ानून धार्मिक मान्यताओं के अनादर की निंदा के लिए ठोस आधार हैं। इन क़ानूनों में नफ़रत फैलाने, भेदभाव या धर्मों के अनादर को अपराध क़रार दिया गया है और इसके लिए सज़ाएं रखी गई हैं। फ़्रान्स में मानवाधिकार घोषणा पत्र और नागरिक घोषणापत्र (1789) से संबंधित क़ानून, नागरिक क़ानून भी हैं और फ़ौजदारी क़ानून भी हैं। ये क़ानून, नागरिकों को दूसरों को बदनाम करने या धर्म, जाति या राष्ट्रियता के कारण दूसरों के अनादर से रोकते हैं। 13 मई सन 2020 को पारित होने वाले ऑनलाइन नफ़रत फैलाने की रोकथाम के क़ानून ने भी नफ़रत फैलाने वाली विषयवस्तु को सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने से रोका है। इस तरह से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि इस्लाम व पैग़म्बर के अनादर के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहाना बनाना, सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लाम से दुश्मनी का चिन्ह है।